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Tuesday, April 7, 2020


जाओ ना कोरोना

चलो कोरोना बहुत टहल लिए
अब जाओ  किसी कंदरा  में
दफ़न हो जाओ |

जाते-जाते प्राथना कर जाना
की ये मानव पशुओं को जीने दे
उन्हें मारना , कूटना, काटना, पकाना
बस अब बंद कर दे |

प्रेरणा दे जाओ मानव को
की फिर से प्रकृति से मिल कर
जिये और जीने दे|

पेड़ होंगे तो साँसे चलती रहेंगी
राजा शेर भी होगा
और उसके साथ रंग-बिरंगे
विभिन्न आकारों, स्वभाव  वाले
जीव होंगे जो तालाब पर
पानी पिएंगे, दौड़-भाग करेंगे
गर्दन ऊँची कर हरे-भरे पत्ते खाएँगे|

मानव मन ये सब देख
प्रफुल्लित होगा
इन अनमोल दृश्यों को कैमरे  में कैद करेगा
बस यहीं तक ठीक रहेगा कोरोना|

करो ना  कैद उनको चिड़ियाघरों में
करो ना  उनकी पैदावार विरानो
में बसाये छोटे-छोटे कैदखानों मे|
सब जीव जंगल के, सड़क के
फिर जियें सर उठा के|

जिनके घर-ज़मीन  पटाकर
मानव ने अपने कंक्रीट के
घरोंदे, सड़के बनायीं,
वहां बाकी जीवों को
शांति से बैठने का, आज़ादी से जीने
का अधिकार वापस करो|

दो वक़्त की रोटी-पानी उन्हें भी मिल जाये
ऐसी वयवस्था कर जाओ कोरोना
सब जीव जंगल के, सड़क के
फिर जियें सर उठा के
फिर समझ लेना तुम्हारा काम पूरा हुआ|

कई हज़ार की बलि लेने के बाद
पेट तो तुम्हारा अब भर ही गया होगा
शहर-शहर गली-गली देश-देश को
आतंकित तुमने बहुत  कर लिया
बस और क्या चाहते हो कोरोना ?

बख़्शो हमें, बख्शों सब जीवों को
बख्श दो हमें अब तुम
बहुत शैतानी कर ली|

अब जाओ भी ना  कोरोना
जाओ ना, बहुत टहल लिए| 

Monday, December 30, 2019



 (Image Courtesy: Google Images 1. One day in 1947 2. A convoy of Sikhs travels to Punjab during Partition 3. Colonial Settlers in Australia circa 1873)

अंग्रेज बहादुर क़ा ख़ूनी केक और HUM हिन्दुस्तानी



देश में बबाल  मचा है | नागरिकता संशोधन एक्ट (CAA) पर जोकि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान के दशकों से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के लिए है और जो दशकों से देश में बदहाली, लाचारी, उपेक्षा का जीवन गुजार रहें हैं|

हिसंक प्रतिरोध जारी है मुख्यतया भारतीय मुस्लिम समुदाय द्वारा जिन्हे कई राजनितिक दलों और हर वर्ग के बहुत से नामचीन बुद्धिजीविओं का support मिल रहा है||

पहली बात तो ये है की किसी भी देश की सरकार जिसके पास जनता का mandate है उसे कानून बनाने का अधिकार है| उसकी बृहत दृष्टि क्या है उस पर बहुत नजरिए  हो सकते हैं पर फिलहाल कुछ प्रताड़ित लोगों को जो  अपनी मिटटी से भाग कर यहाँ शरण लिऐ  हैं उनको CAA नागरिकता देता है तो भला उसमे मेरा और किसी का चाहे किसी भी धर्म का हो उसका क्या नुकसान है?

मेरा देश मेरी पहचान है


में अपने ऑस्ट्रेलिया के अनुभव साझा करना चाहती हूँ इस मुद्दे पर जहाँ की में बरसों से permanent resident (PR) हूँ | मुझे सालों से वहां नागरिकता लेने का अधिकार है पर उसके लिए आज तक भी मेरा दिल मेरे दिमाग के हत्थे नहीं चढ़ पाया| मुझे कभी मंजूर नहीं की मेरे पासपोर्ट पर उस रानी की फोटो या मोहर लगे जिसके नाम पर Great  Britania  के वाशिंदो ने हर तरह का छल-कपट , लालच-प्रलोभन देकर देश को अपनी मुट्ठी में जकड कर  रखा दो शताब्दी तक|

इस दो-चार दिन के जीवन मुझे अपनी पहचान (identity ) सबसे जरूरी है बाकी सब इसके आगे फीका है| अगर नागरिकता  ले लेती तो मेरी आत्मा जिसने इस देश की मिटटी में शरीर धारण किया उसकी पहचान नहीं बदल जाती|  में ऑस्ट्रेलिया में - that Indian woman, black woman, peson of  colour, migrant  थी, हूँ और हमेशा रहूंगी |य

मुझे इस बात से कोई गिला नहीं है, ऑस्ट्रेलिया मेरी दूसरी पालनहार मां है और रहेगी | ऑस्ट्रेलिया  में सरकार के पास हर निवासी का data  है|  यहाँ तक आप single हैं, couple  हैं, कितने बच्चे हैं,कितने bedroom के कैसे घर में रहते हैं|  वहां के के लोग इस बात से थोड़ा irritate हो सकते पर उन्हें मालूम है की यह जरूरी है क्योंकि कोई भी nation state एक वयवस्था का नाम है | वहां की वयवस्था साफ़-सुथरी गड्डा मुक्त सड़के,स्वच्छ सुन्दर green areas, बेहतर जनपरिवहन, स्वास्थय  सेवाएं, police, social  security  और वो हर चीज जो नागरिक को अच्छा जीवन-यापन करने के लिए आवशयक मानी  जाती है और जिसे उपलब्ध कराना सरकार की constitutional और mandatory जिम्मेदारी है वो सरकार उपलब्ध कराती है|

लोग तरह=तरह के छल-प्रपंच करते है ऑस्ट्रेलिया में entry  पाने के लिए|  जैसे की एक नागरिक भारतीय भाई अपनी सगी बहन से शादी दिखा कर उसे लाने की  कोशिश करता है|  कुछ लोग अपनी PR  या नागरिक mature लड़कियों, बहनो का इस्तेमाल बड़ी रकम देकर लड़को को migrate कराने  में लगे रहते है|  साल दर साल. एक शादी करवाई, mandatory time period तक रिश्ता कागजो में निभाते रहे, इस बीच दुसरे client को तैयार करते रहे और free  का पैसा बटोरते रहे|  बहुत से भारतीय भारतीय छात्र लड़के कई बार Australian  single  महिलायों को प्रेम के नांम शादी में फंसा लेते हैं  ताकि रहने के लिए जुगाड़ हो जाये  और एक बार PR  या नागरिकता पाने में कामयाब हो जानते है तो अक्सर जीवन-मरण के  प्रेम को तिलांजली  देकर अपने रास्ते बढ़ जाते हैँ| एक और किस्सा  की एक छात्र Christian  बन कर Australian immigration में गुहार लगाता रहा इस premise पर की अब उसका भारत में परिवार उसे प्रताड़ित कर रहा है क्योंकि वो ईसाई  बन गया है | बहुत से लोग जर्जर नावों में बैठकर ऑस्ट्रेलिया पहुँच गए और वहां की सरकार ने एक established process  के तहत बहुतो  को बसा लिया उनमे से कई उच्च public पदों पर रहकर अपने adopting देश की growth story  में योगदान दे रहें हैं|

वहीँ एक migrant  नागरिक अपनी कट्टर सोच के चलते सिडनी के प्रमुख जगहों पर जेहादी पर्चे बाटता था और एक दिन उसने अपने जेहादी जूनून में एक सुहानी सुबह एक नामी कैफ़े में आये लोगों को बंधक बना लिया. दो प्रखर, जवान, career  के शीर्ष पर बैठे Australian नागरिको की जान चली गयी police operation में वो भी मारा गया क्या मिला किसको, क्या ऑस्ट्रेलिया इस्लामिक state  बन गया?

प्रतिरोध करें, मेरी मेरी बसें क्यों फूंकी ?


आज जो जगह जगह हिंसक प्रदर्शन चल रहा है उससे मुझे क्या मिलेगा  प्रतिरोध करें, खूब करें पर देश समाज की established मर्यादों में रह कर|  आम जनजीवन को खतरे में डालने का उसे अस्तवयस्त करने का किसी को अधिकार नहीं है|  मेरी बसें क्यों जलाई? मेरे टैक्स के पैसे से खड़ी  की गयी सार्वजनिक संपत्ति को क्यों तोड़ा-फोड़ा जिन बसों में तुम भी दिन-रात घूमते थे उनको जलाकर क्या मिला? कुछ फूँक कर विद्रोह करना तुम्हारा तरीका है तो अपने खुद के vehicles  क्यों नहीं फूंके, अपने घरों की खिड़की-दरवाज़ों पर गुस्सा क्यों नहीं निकाला?

जब से होश संभाला है, अगर कोई पूछता था, ज्यादातर विदेश प्रवास के दौरान की में क्या हूँ  तो मेरा जवाब होत्ता था की में हिन्दू हूँ, मुसलमान हूँ, सिख हूँ,ईसाई  हूँ, बौद्ध हूँ, जिसको जो मानना है मान लो| CAA को लेकर प्रतिरोध के सन्दर्भ से लगता है की बेहतर होता की धर्म को define न कर सिर्फ ये लिखा जाता ये ACT  persecuted minorities, ३ पडोसी देशो से आये शरणार्थी के  लिए है | और CAA की वयवस्था इतनी चाक -चौबंद रखी  जाती की जो लोग धर्म के नाम पर प्रताड़ित नहीं है फिर भी इसके तहत आने का प्रयास करते इस नीयत से की देश में दंगा-फ़साद करायें , आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे उनको CAA की वयवस्था decline कर सकती थी ठोस parameters पर |

अँगरेज़ बहादुर किस हक़ से मेरी ज़मीन के टुकड़े कर चल दिए


एक दूसरी बात जो में बरसों से पूछना चाहती हूँ पर पता नहीं किससे  पूछूँ की जब British India  के  धर्म के आधार पर रातों-रात टुकड़े कर दिए गये  तब ये प्रदर्शनकारी कहाँ थे ?तब लोग क्यों नहीं खड़े हुये  जिन्ना, नेहरू, गाँधी, उन लोगो के ख़िलाफ़ जो धर्म  के आधार पर हमारे लोगों का कत्ले-आम करा रहे थे? तब लोग क्यों नहीं उतरे  सड़को पर ये बताने के लिए की पहली बात तो हम धर्म के आधार पर देश के टुकड़े नहीं होने देंगे और दूसरी बात ये की टुकड़े करे बिना नहीं मानोगे तो जो जहाँ रहता है उसे वहीँ रहने दो | एक secular देश बनाने का वायदा किया था जिन्ना ने फिर ट्रेनों में लोग क्यों काटे गये | जो लोग पुश्तों से एक दुसरे के साथ रहते आ रहे थे वो कैसे एक दुसरे की गर्दने काटने लगे ? जो लोग एक दुसरे के लिए फूलमालायें बनाते थे, मज़ारों पर चादरे चढ़ाते थे, एक साथ ताज़िए उठाते थे, गुरु का लंगर छकते थे,रामलीलाएं करते थे कैसे एक दुसरे की बहन-बेटिओं का चीरहरण करने लगे?

और अंग्रेज British India को अपनी farewell party का केक  समझ काट रहे थे? वो तो अपना बोरिया-बिस्तर और जाने क्या क्या समेट  कर ले गये  यहाँ से | उनसे किसी ने पूछा कि  सरकार  की जिम्मेदारी नहीं थी क्या की सब नागरिक अंग्रेज  बहादुर की खींची  सीमाओं के आर-पार सुरक्षित जा सकेँ? और फिर अपने वायदे को भूलकर पाकिस्तान ईस्लामिक राष्ट्र बन गया | तब क्यों नहीं विद्रोह उठा देश से लेकर UN तक की पाकिस्तान सबका है धर्म के परे | जो  देश राजधानी का नाम इस्लामाबाद रखे उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है की उस देश में अन्य धर्म के लोगों को समान अधिकार मिलेगा ?

अंग्रेज  ने ये कैसा केक  काटा की अपनी ही ज़मीन  पर अन्य धर्म के लोग unwanted, दोयम दर्ज़े के नागरिक हो गये ? ज़ाहिर  सी  बात है बहुत लोग दिन-रात की जिल्लत बरदाश्त नहीं कर पाये  और हिंदुस्तान आते रहे, बसते  रहे | उनकी पुश्तों की पहचान अंग्रेज बहादुर ने अपनी कलम से मिनटों में मिटा दी, उनके अस्तित्व पर एक खौफनाक प्रशनचिन्ह  बिठा दिया | अंग्रेज बहादुर अपनी तथाकथित उच्च सभयता  का परचम लेकर कहाँ कहाँ नहीं गया फिर कैसे उसकी रानी की सरकार ने लाखों लोगो को कटने  दिया, उजाड़ दिया | विभाजन का केक  खून से सराबोर कैसे हो गया ?

इस मिटटी का शासन बदलता रहा British India  से पहले मुग़ल इंडिया, उससे पहले कुछ और, इस बीच पिछले दोसों सालों  में पूरे  विश्व में हर क्षेत्र में व्यवस्था, क़ानून  विकसित होता रहा | पिछले ७० साल से हिन्दू-मुसलमान का ढोल, जिसकी ताल अंग्रेज बहादुर बिठा कर गया native सूरमाओ के साथ मिल कर, सीमा के आर-पार बज रहा है | इसकी आवाज़ कर्कश है, दिल दहलाने वाली है, हमारे अपने लोग इस ढोल की ताल से तरंगित होकर अपना ही घर फूंकने में लगे हुये हैं |

मेरा जेहाद है हर सांस में क़बीर हो जाना


और में पूछती हूँ की अंग्रेज बहादुर तुम जब अपनी रौबदार वेश-भूषा, हष्ट -पुष्ट घोड़े पर बैठकर मेरे शहर में गश्त करते थे तो मेरी माँ को सहम कर सड़क किनारे दुबकने का अपमान क्यों सहना पड़ता था ? और मेरा क्या कसूर की में खुल कर अपने लाहौर, पेशावर नहीं जा सकती जहाँ की बातें मेरे नाना बताया करते थे ? मेरी  और जाने कितने ही लोगो की प्यारी , माती (सरला ठकुराल, अविभाजित हिंदुस्तान की पहली महिला पायलट) दिल्ली में आके बस गयीं  अपना लाहौर उन्हें छोड़ना पड़ा | बहुत पीड़ा होती होगी पर कभी दुखड़ा नहीं रोया | पर फिर भी नब्बे से ऊपर के उम्र में अपना लाहौर का पता मुझे लिखवाया, कहा बेटे कभी वहां जाना  हो दो देख कर आना मेरा घर |

इतना बड़ा खिनोना काम कर गया अंग्रेज बहादुर इस देश के लोगों के साथ | वो तो आराम से चला गया, आराम से यहाँ रह गया, अपने तरीके से, अपने कुत्तों, जिमखाना, क्लबों, अर्दलियों के साथ और हम हैं की उसकी लगायी आग आज तक नहीं बुझा पाए बल्कि उसमे दिन-रात नफरत, अविशवास , धमकियों की आहुति   देते रहते हैं |

और फिर तथाकथित शांतप्रिय प्रदर्शनकारी मेरा क्या करेंगे ? ना  में हिन्दू हूँ, ना  मुस्लमान हूँ, ना ईसाई , ना पारसी, ना बौद्ध, अथवा अथवा ? हिन्दुस्तानी हूँ, दो हाथ दो पैर वाला इन्सान  हूँ | CAA  हो, NRC हो , मुझे किसी बात का डर नहीं | जो शरणार्थी हैं  उन्हें अधिकार मिले, वो आगे बढ़ें, उनके आसूं थमे उसमे सबका भला है | मेरी हिंदुस्तानियत को किसी धर्म की बैसाखी की ज़रूरत नहीं है | मेरे नाना-परदादा जाने कितनी पुश्तों से इसी ज़मीन पर गुजर-बसर कर इसी मिटटी में मिल गये, British India  तो बाद में बना| |

में nation state  से नहीं हूँ, में हूँ तो nation  state  है | और फिर कल को NRC के लिये  कागज़-पत्तर करने भी पड़े तो क्या डर है ? बोलूँगी  उन NRC वालों को की चले जाओ मेरी मिटटी में जहाँ मेरे पूर्वजो की बनाई गयी पानी की प्याऊ आज भी है, उनका लगाया गया बाग़  आज भी है | में मरने के बाद जलूं या दबूं , मुझे कोई फर्क नहीं पडेगा | मुझे यमराज अपने बैल पर बिठा कर ले जायें , मुझे जन्नत मिले या दोज़ख , 72 हूरें या हुडदंगी मिलें , कोई फर्क नहीं पडेग़ा| मेरे लिए असली ज़िहाद  है, धर्म, पंथो, जात -पात, gender, सीमाओं, काले -गोरे , जानवर-इन्सान की थोपी हुई बेचारगियों से परे हो जाना जीते जी| हर साँस  में क़बीर हो जाना मेरा ज़िहाद है| मेरे निजामुद्दीन में बैठे औलिआ मेरे सर पर अपना हाथ रखना बस|

मेरे अपने, मेरे सगे वाले, मेरे मुस्लमान और सभी विद्रोही साथियों अपनी बात रखो, जरूर रखो पर अपनी बोखलाहट, अपवाहों, संदेहों की आग में मुझे मत लपेटो |
जय हिन्द |

(C)SumeghaAgarwal


Tuesday, September 5, 2017


वो पूछती है

सिडनी 2015


वो पूछती है मुझसे
तुम्हारा इरादा क्या है

कहती है की तुम्हारा
तो सिगरा सिस्टम ही
गड़बड़ है |

ये भी कहती है कि
थाली के बैंगन की तरह
लुढ़कते रहते हो |

और ये भी कि
तुमने कभी कोई कोशिश
नहीं की अपना जन्म
सार्थक करने की |

नाहक ही जन्मे हो
आज यहाँ तो कल वहां
एक काम पकड़
जीवन का कल्याण
क्यों नहीं करते |

उसकी कड़क
घृणा से भरी
इल्ज़ामी उंगली
जाने कब से मुझे
मिटटी में मिलाकर
पैरों तले रौंदना चाहती है|

दिन-रात नये जीवन
को अपने हाथों के
सहारे दुनिया में प्रवेश देती है |

पर उसका बस चलता
तो मेरा बीज पनपने से
पहले ही किसी
कूड़ेदान में वो फ़ेंक आती |

वो पूछती है मुझसे
तुम्हारा इरादा क्या है| 

Sunday, February 19, 2017

एक सरकारी कोठरी

अहोभाग्य उसका कि विधवा थी । मतलब पूरी तरह क़ाबिल  थी एक मुफ्त सरकारी flat  पाने के लिए ।

अहोभाग्य उसका कि  उसे पढ़े-लिखे लोगों  का साथ मिला ।

हुआँ  यों कि  सरकार ने जारी की थी एक scheme  मज़लूम  शहरी गरीबों  के लिये  ।

अनुभा ने उस युवा विधवा को कहा कि  क्यों न वो भी बहती गंगा में हाथ धो ले । कागज़-पत्तर की चिंता न करे क्योंकि अनुभा को सब आता  था, कहाँ  कैसे क्या कागज़  पूरे करने होगे ।

सोना ने इतना कुछ झेला  था मात्र बीस-पच्चीस  की उम्र में कि  उसे किसी पर विश्वास नहीं थ। किसी से उम्मीद नहीं थी  अनुभा के समझाने -बुझाने पर वो तैयार हो गई इस जटिल  कागज़-पत्तर की  यात्रा में साथ देने के लिए ।

और इस तरह मुहिम शुरू हुई एक सरकारी सौगात पाने की ।

विडंबना ही थी कि जो सरकार, लोगो को अपने ही गाँव को छोड़ शहरों  की तरफ़  भागने को मज़बूर कर देती है। आज उन्हीं  लोगो को अब शहरी गरीब की श्रेणी में आते थे, उनके लिये बाकी  शहरियों की तरह फ्लैट में रहने का सपना बेच रही थी , अपना वोटबैंक बढ़ाने  लिये  ।

शहर जो आपका सब कुछ निचोड़ लेता है, इससे पहले की आपको कुछ दे } सोना पढ़ी-लिखी नहीं थी । उसके पास शरीर था और उसका मकसद था की अपने दो मासूम बच्चो को पाल-पोस कर बड़ा कर सके । शहर ने उसके शरीर से खूब काम करवाया । झाड़ू-पोंछा , बर्तन और खाना बनाना । वो बड़े-बड़े फ्लैटों में जाती थी और शहरी लोगो को बड़े आराम से गुजर-बसर करते देखती। वो खुद आस-पास सस्ते मोहल्ले में कमरा लेके रहती थी।

अनुभा सोचती थी कैसी है यह सरकार, जिसकी  नेता प्रदेश में अपनी मूर्तियां बनवाने-लगवाने में करोड़ो  रुपया खर्च रही थी खुद बड़े ठाठ -बाट से थी खुद सदियों से दबे-कुचले दलित पृष्ठभूमि से निकली ये महिला नेता वोट पाने के लिए, मुफ्त सरकारी फ्लैटों की रेवड़ियां  बाँट रही थी ।

anyway , सोना  और अनुभा ने मिलकर बहुत पापड़ बेले। मई-जून की भयंकर गर्मी में सड़के नापी । कागज़ पूरे  किये - जाति  प्रमाणपत्र , फ़ोटो  और जाने क्या-क्या । हर बार सरकारी दफ़्तर  कोई नो कोई नयी बात बता देता । पर अनुभा  ने हर नहीं मणि । अपनी बुद्धि , शिक्षा का प्रयोग कर वो हर सरकारी जरूत को पूरा करती रही ।

और फिर एक दिन , सरकारी दफ्तर के बाहर  लगे काले बोर्ड पर चिपके नोटिस पर अपना नाम पहचान कर सोना गदगद हो गयी । फ्लैट की चाबी सरकारी बाबू से collect कर वो अनुभा को साथ लेकर उस शहर सो थोड़ा बाहर बनाये गए बहुमंजिला सरकारी आवास के कंपाउंड पर पहुंची ।

सोना का चेहरा भाव-शून्य  था उसे लगा इससे बेहतर तो उसके 'गरीब' गाँव का  छोटा पर दिल से बनाया आधा पक्का, आधा कच्चा घर था । उसने छूटते  ही बोला की ये सरकारी मुफ्त आवास को flat नहीं एक सरकारी कोठरी कहना बेहतर होगा ।

इस सरकारी आवास योजना को पूरा हुये  अभी कुछ ही समय हुआ था पर उसकी बाहरी  और भीतरी दीवारों में जगह-जगह बड़े बड़े चप्पों  से बालू झड़ रहा था. चिर-परिचित इस्थिति थी  ही की बालू  में सीमेंट मिलाया गया था या बालू  में चुटकी भर सीमेंट मिलाकर building  बनायी  गयी थी। खुली नालियां गंधा रही थीं । एक मुफ्त में ही शहरी मलिन बस्ती बसा दी थी प्रदेश की महान महिला नेता ने ।

flat  के अंदर bathroom  में दरवाज़ा ही नहीं था । पता लगा कि  हज़ार से ऊपर फ्लैटों में, ठेकेदार एक दरवाज़ा गटक गया और उसने अपने मुनाफे में और बढ़ावा कर लिया इस जुगाड़ से ।

सोना को जो मिला उसने स्वीकार कर लिया और जुट गयी अपने एक कमरे के flat को शहरी संभ्रांत लोगो जैसे फ्लैट में बदलने के लिये  । उसने बढ़िया शावर हेड लगवाया, किचन में मार्बल का बेंचटोप  लगवाया । फर्श खुदवा कर सफेद टाइल लगवायी । और भी बहुत कुछ करती रही वो छोटे से फ्लैट को सजाने में । मिली तो थी उसे एक मुफ्त सरकारी कोठरी, पर उसे उसने एक आकर्षक फ्लैट में बदल दिया ।

उस सरकारी मलिन बस्ती में सब मिल-जुल कर रहते थे। रोजमर्रा की तकलीफों  को , गंदगी  को, बदइंतज़ामी  को ये शहरी गरीब मूलतया चुप रह कर निभाते थे ।

और जब ये सरकारी मिलन बस्ती में धीरे-धीरे रौनक बस गयी तब उस प्रदेश की मुख्यमंत्री जिनकी वह सौगात थी , एक दिन आयीं  उस जगह का औपचारिक उद्घाटन करने के लिये ।

सोना ने भी उन्हें देखा, अपने आवास की छत  पर बाकि बस्तीवासियों  के साथ मिल कर ।
सोना बड़ी प्रभावित हुई , मुख्यमंत्रीजी के बढ़िया कढ़े  और पक्के काले रंगे  हुये  बालों  को देख कर ।

इस बीच, अनुभा को सरकार की , ठेकेदारों  की बन्दर-बाँट साफ दिखती थी । पर कुछ कर नहीं सकती थी ये तो हमेशा से ही होता आ  रहा था इस देश में । छोटे-बड़े नेता छोटे-छोटे प्रलोभन देकर गरीब का वोट हासिल करने में जुटे रहते थे । मूल-भूत आवशयकताओं  को पूरा करने, दर-दर भटकते इस देश के लोग, जो भी थोड़ा-बहुत मिलता सर-झुका स्वीकार कर लेते थे , खुश रहते थे की चलो कुछ तो मिला ।

आने वाले चुनाव में सोना ने ख़ुशी-ख़ुशी वोट उसी पक्के काले रंग बालों वाली महिला को दियाI  अपने गांव से जल्दी वापस लौटी सिर्फ़ वोट देने कि ख़ातिर । सोना के हिस्से में एक free कोठरी आई और नेता के हिस्से में परम सत्ता ।


Wednesday, February 24, 2016

New Delhi Cantonment
Circa 1987

ओ पीले पत्ते

ओ पीले पत्ते,
देख लिया तुमने आज़
जो पेड़ से जुड़ा रहना था तुम्हारा
एक भ्रम ही था ।

पेड़ ने, एक हवा का झोंका आया
और अलग कर दिया तुमको
कितनी आसानी से ।

तुम उस पर उगे, पनपे
उसकी सांसो से जुड़ी थी
तुम्हारी सांसे ।

कितने दिवसों तक
तुम उसके साथी रहे
पर तुमने पाया कि
धीरे-धीरे तुम कमज़ोर हो रहे थे ।

और पेड़ वहीं था खड़ा सुगठित
अपने यौवन में मदमस्त ।

कल तक तुम जीव थे,
आज अजीव हो ।
और अपने जैसे सैकड़ों के साथ
मिल कर बन गये हो ढ़ेर
एक कूड़े का ।

क्या पेड़ का ये करना सही था?
शायद हां,
क्योंकि तुम एक भ्रम
में जी  रहे थे जुड़ाब  के ।

और फ़िर  ये भ्रम फ़िर जितनी जल्दी टूटे अच्छा है
ताकि तुम जान सको यथार्थ क्या है। 

दोस्त पेड़ तो धन्यवाद का पात्र है तुम्हे यथार्थ में लाने के लिये,
और फिर तुमने पेड़ के दर्द को नहीं समझा। 

क्या वो अनभिज्ञ है  इस बात से,
कि तुम अलग हो रहे हो ।
नहीं, सोचो तो चाहे अनचाहे
उसे अपने एक अंग से विदा लेनी ही होगी ।

ओ पीले पत्ते,
देख लिया तुमने आज़
जो पेड़ से जुड़ा रहना था तुम्हारा
एक भ्रम ही था । 

दिल से

बहुत कुछ चल रहा है देश में। बहुत कुछ कहने के लिए है मेरे पास भी पर समय उलझाए रखता है रोजमर्रा की भागदौड़ में ।

पर अब और नहीं डिले कर सकती इस पोस्ट को पोस्ट करने में। हिंदी में लिख रही हूँ क्योंकि ये भाव हिंदी में ही परवान चढ़ रहा  है पिछले कई दिनों से। वो दोस्त जो हिंदी नहीं समझते है, फिलहाल माफ़ करयेगा , में इंग्लिश अनुवाद भी जल्द पोस्ट कर सकती हूँ ।

JNU में जो चल रहा हा उसके बारे में कुछ कमेंट करना उचित नहीं होगा क्योंकि देश से बाहर हूँ। और  में  नहीं चाहती की जो कहना चाहती  हूँ वो ugly वाद-प्रतिवाद में उलझ कर दम तोड़ दे।

पर इतना जरूर है की तिरंगा, जनगणमन, और वन्दे मातरम किसी निज़ाम की मल्कियत नहीं हैं । अपनी बात करूँ तो मेरे लिए हिंदुस्तान, भारत, India मेरी पहचान है  - एक सांस्कृतिक पहचान, more then just being a geo-political reality

ये एक ऐसी पहचान है जो आखिरी साँस तक रहेगी और जिसे बनने में जाने कितनी सदियाँ लगी है । मेरे लिए देश अपनापन है , बचपन की यादें और वहां बिताये जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव हैं ।  भारत मेरी माँ की जन्मभूमि है । विदेश में मेरे पैर  भले  ही हर तरह के संगीत पर थिरकते हो, मेरी जबान हर तरह का खाना चख चुकी है पर तृप्ति तो अपने यहाँ की दाल-रोटी (इडली-सांभर) में ही मिलती है । दिमाग कहीं भी घूमे पर दिल तो अपनी हिंदुस्तानी गलियों में बसता  है।

बाहर, विदेश में धीरे-धीरे, परत दर परत अपनी  पहचान के चिन्ह छूटे जाते हैं, जैसे की दिल्ली की बसें कभी सामने से निकल जातीं थीं । होली के रंग, दिवाली की मिठाइयां (including मिलावटी ) और भी अनगिनत त्यौहारों, की ना तो तारीख मालुम होती   है , ना   ही वो माहौल होता है की उन भूले-बिसरे रसों में अपने को भिगा  लूं ।

बरसों से अपनी पहचान संजों के रखी है । हर जगह, हर मकाम  पर अपनी  अनोखी मिटटी की खुशबू की हिमायत की है । कितनी भी fairness cream लगा लूं पर रहूंगी brown ही, कितनी भी बढ़िया अंग्रेजी बोल लू पर रहूंगी देसी ही। और इस बात से मुझे कोई तकलीफ़ नहीं है, कोई देसी भला विदेसी क्यों होना चाहेगा ???

तकलीफ़ हो रही है ये सुनकर, देखकर की देश के लोग देश के नाम पर एक दूसरे को माँ-बहन की गालियां दे रहें हें ।  पता नहीं कब हम बाप-भाई की गालियां ईज़ाद करेँगे , just kidding. JNU की घटनाओं को लेकर पर इतना घमासान चल रहा है की लगता है, किसी भंसाली की महफिल्म का महायुद्ध चल रहा हो।

मुझे असली देशद्रोह तो वो लगता है,जब खुले में नित्त्यकर्म करना हमारी आम महिलाओं की मज़बूरी है तो  क्या दिल्ली हो या देहात के खेत-खलिहान । जगह जगह पड़े कूड़े के ढेर देशद्रोह के खुले प्रमाण हैं । मैंने भी जाने कितने कूड़ो के ढेरों को, कीचड़ भरी गलियों को टाप टाप कर अपनी जीवन नैय्या को खेया है ।  मेरी शिक्षा हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूल में हुई है।  और जो values मुझे मेरे शिक्षकों से मिले, काले खुरदरे blackboard पर लिखी प्रेरक इबारतें ने जो छाप मेरी पहचान पर छोड़ी है, उसे न कोई मिटा पाया है ना मिटा सकेगा ।

मेरी नज़र में देशद्रोह तब होता है जब हमारे गरीबी-बीमारी के मारे लोग अपने घावों का प्रदर्शन करतें हैं, चन्द पैसों की भीख पाने की लिये हमारी सड़कों , हमारे धार्मिक स्थानो के बाहर  ।

देशद्रोह तब हुआ था जब किसी totally different देश के लोग, अपने जहाजों में भर कर आये व्यापर करने के लिए पर पूरे देश को  ही हतिया लिया हमारे लोगो का साथ पाकर।  वो देशद्रोह (मानवता द्रोह ) था जब उन लोगों ने अपने लाल-नीले कलम चला कर हमारी मिटटी के टुकड़े-टुकड़े कर दिये । लाखों लोग एक विदेसी सरकार की नालायकी की वजह से बंटवारे में इक दूसरे को काटते  चले गये  और तब की अंग्रेज सरकार अपना बोरिया -बिस्तर बांध कर भागने में जुटी थी । 

हम क्यों नहीं जवाब मांगते उन अँगरेज़ सरकारों से, उनके वंशजो से जिन्होंने हमारी पहचान के साथ खुले-आम खिलबाड़  किया ।  उन्होंने हमारी मिटटी के हे टुकड़े नहीं किये बल्कि पहले से ही जात -पात से त्रस्त समाज को और भी categories में बाँट दिया ।

मेरी देश में आस्था मानवतावादी है । जो देशवासियों के लिए उचित है वो सम्पूर्ण मानवता के लिए भी उचित होना चाहिये सर्वेः संतु निरामयाः सर्वेः संतु सुखिनः की तर्ज़ पर ।

कई बार लगता हे, तमाशबीनी हम्हारी फ़ितरत में है ।  अभी कहीं देखा है एक बन्दर के हाथ-पैर बांध कर उसे भीड़ के बीच चोरी के अपराध की माफ़ी मंगवाई जा रही थी   । एक आवारा  (देसी ) कुत्ते को pole से बांध कर अधमरा किया जा रहा था, अगर विदेसी कुत्ता होता तो शायद raffle draw करना पड़ता क्योंकि हर कोई उसे अपनी  बाँहों में झुलाना  चाहता । 

और अब हम JNU प्रकरण को बीच में डालकर मजे ले रहे हैं जबकि हमारे आस-पास हमारे लोग, झंडा, गान सब कुछ होते हुए भी नरक से बदतर माहौल में रहते हैं और मिनिमम जरूरत से भी कम साधनो को लेकर जीते हैं ।

 अगर गलती से, हाँ गलती से आप इनके दरवाज़ों पर जा पहुंचे तो ये लोग सामान्तया अपनी आखिरी और पूरी  रोटी आपके हवाले कर देंगे। ना  वो देशद्रोही हैं न मानवता द्रोही - वो तो बस आम हिंदुस्तानी हैं मेरी तरह ।

पता नहीं किसने क्या नारे लगाये , पर क्या देश कच्ची मिटटी का घड़ा है जो ऐसे नारों के कम्पन से चूर चूर हो जागेया  । पता नहीं किस कोने कोने में देशद्रोही literature और भड़काऊं भाषणों  की recordings भरी पड़ी है , मुझे लगता की देश जिसे सदिओं  की विरासत प्राप्त है - ज्ञान, तप , भक्ति, सदभावना  की वो ऐसी  situationsको अपने न्यायसंगत, भयमुक्त system के तहत  निबटाने की ताकत भी रखता ही होगा।



Tuesday, February 23, 2016


That house in the middle will stand

Year 2000 Sydney

The other day
I heard them talking
In the marketplace, at the school.

They all said,
World was coming to an end.

They all had misery
Painted on their faces,
The world they knew, was coming to an end.

They looked for their prayer books,
Polished their gods, chanted their mantras
As the world was coming to an end.

I remained unfazed in the midst of
This widespread panic and desolation.

The world might be coming to an end
But I knew that,
That house in the middle will stand.

Will stand firm
On its foundations
Built so lovingly,
By a builder exemplary.
A female in this case.

I walked home
unperturbed, confident.

The world might come to an end
But that house
In the middle will stand.

My mother supreme was there,
Looking out from the window for my sight.
She was unaware of all the fuss around
Over the world coming to an end.

She looked at ease and content.
She knew her dream was alive and kicking,
And was coming
Home to rest and rejuvenate.

She admired one more time,
Her love curried over the stove
She was ready to
spoon out flavoursome
foods for my tired body.

The world didn't come to an end
And that house
In the middle remained.

 

Monday, January 18, 2016

मेरा कुछ वज़ूद था ।

मेरा कुछ वज़ूद था
एक वतन था
एक सोच था , रौनक थी
उदासी थी पर मेरी थी
अब बेवज़ूद बेवतन हूँ ।

कंकरीट की धरती में
जड़ें जाती नहीं
सिकुड़ जाती हैं
काँप जाती हैं।

मुश्किल है नयी
अंजानी धरती में
जमना बिन किसी माली के।

बस अब इतना ही है
कि अपनी जड़ें इकट्ठी कर
अपने ही दामन में
छिपाये घूमती हूँ ।

तलाश है उस 'वतन'
की जहाँ में फिर से खिल सकूँ
खोज है अपने अंदर
के वतन की जहाँ में
खुद को दफना सकूँ
फ़ना हो जाऊँ ।

सरहदों, बंधनो
सोचों, परिवेशों
के बाहर खुद
अपनी ही ज़मीन में ।

मेरा कुछ वज़ूद था
एक वतन था ।

Thursday, November 18, 2010

मखमल में पैबंद हूँ

DATELINE INDIRAPURAM
6-11-2010


मखमल में पैबंद हूँ
बरसों रही यही हैसियत मेरी |

मखमल को वो सहेजती रही |

पैबंद मखमल के साथ
अपनी कमजदगी का एहसास लिए
बरसों धुना, पिटा, निचुड़ा
पर मखमल का हिस्सा रहने
की मुहिम जारी रखी
पैबंद ही सही, पर था 
वो मखमल का हिस्सा |

फिर एक दिन पैबंद को
एहसास हो उठा कि
वो सिर्फ पैबंद नहीं है
वो तो मखमल का ही एक
मखमली हिस्सा था |

और फिर उसने मुहिम छेड़ दी
मखमल से अपना मखमली
वजूद स्वीकार करवाने  की |

पैबंद जागरूक हो उठा था
उसे अब और दबे-कुचले रहना
मंजूर नहीं था |

पर जो आँखे, जो हाथ, जो आत्मा
उसे बरसों पैबंद की पदवी पर बिठाये रखी
वो तैयार नहीं थी  पैबंद को
अपने विशाल मखमल का
मखमली हिस्सा मानने के लिए |

उसने कह दिया पैबंद से कि
क्यों इतना दुसाहस करते हो
पैबंद हो पैबंद रहो, मेरे मखमल
क़ी तरह मखमली वजूद पाने क़ी
ख्वाइश ना रखो | 

नहीं तो ये लो तुम्हे उखाड़ फेंकती हूँ
अख़बार में विज्ञापन भी बुक करा दिया है
तुम्हारी कमजदगी को जगजाहिर करने के लिए |

पैबंद व्यथित था, थक चुका था
उसने सोचा कोई बात नहीं, इससे
पहले तुम उखाड़ के फेंको, ये लो
में खुद अपने को अलग कर लेता हूँ
में पैबंद हूँ तो फिर मखमल
में मेरा क्या काम |

यही सोच पैबंद ने अपने
ताने-बाने को बटोरा और एक
दिन चुप-चाप अपने को
मखमल से अलग कर लिया |

गजब ये हुआ कि जो पैबंद था
वो मखमलमालकिन की आत्मा
को ढके हुये था |

पैबंद हटते ही मखमलमालकिन
की आत्मा कलप उठी |

उसका आवरण हट गया था
अब वो किस मुंह अख़बार में
विज्ञापन देती |

आज तो पैबंद ने हद ही कर दी
मखमलमालकिन
की बरसों पुरानी, सड़ी-गली आत्मा
को ही नंगा कर गया वो |

मखमल में पैबंद हूँ
बरसों रही यही हैसियत मेरी |

©sumeghaagarwal 






Wednesday, November 3, 2010

हाँ यही प्यार है

हाँ यही प्यार है
DATELINE INDIRAPURAM
8-9 -2006

हाँ यही प्यार है|
सच है ये प्यार
वो गालियों की बोछारें
वो इल्जामो के पुलिंदे
का कोई जवाब होता तो देती
वो सब थी तुम्हारी भरपूर कोशिशें
इस प्यार को झूठा साबित करने की|

पर जिस प्यार पर ना तुम्हारा
बस था ना मेरा है,
वो एक सच ही तो है |

चाहे कितना ही मंथन कर लूं
मेरा दिल दिमाग के हत्ते नहीं
चढ़ता इस मामले में |

सारे संशय, सारे प्रयास
इस प्यार को भुला देने में
बेकाम हैं|

वो जो सच था, अब भी वहीँ
उसी द्रढ़ता के साथ
खड़ा है हमारे तुम्हारे बीच|

मैंने तो इसे कब का गले
लगा लिया पर तुम्हारी
सरकारी मुहर की इसे
अभी दरकार है |

इतिहास जब लिखोगे तुम अपना
तो किस पन्ने को खाली छोड़ोगे |
कैसे जीवन के इस सच को छिपाओगे,
कब तक भागोगे इस से |

भाग तो रहे हो जाने कब से
पर फिर बार-बार अपने
को इस सुच के रूबरू
क्यों पाते हो ?

एक सवाल है तुमसे
एक सवाल है अपने आप से
कि अगर ये सच नहीं है
तो क्यूं तुम हर षण
साथ-साथ रहते हो ?

क्यों जीवित हो अब तक
क्यों जीवित हूँ में अब तक?
क्यों तुमने पूर्व जन्मो का हवाला दिया था ?

क्यों तुम सच उगल जाते हो
दूरभाष के लम्बे तार्रों पर ?

क्यों तुम जब मिलते हो
तो इस सच को निगल जाते हो ?

कुछ समझ है तुम्हारी कायरता की,
तुम्हारी मजबूरियों की |

पर कितनी बार कहा कि
मेरी ताकत के सहारे एक बार
यह तो स्वीकार कर लो
कि ये सच है |

अंगीकार कर लो इस सच को
चैन से तुम भी सो पाओगे
और हम भी |

इस प्रोजेक्ट प्यार की इतिश्री
कर दो वर्ना
अगले जीवन में फिर
तडपोगे, तडपाओगे |

कर्मयोग समझो इसको,
मुझे भी इस बंधन से
मुक्ति की दरकार है |

आओ दो-दो हाथ कर लें
इस सच से,
ताकि फिर चल पायें
हम अपने अपने रस्ते |


हाँ यही प्यार है
सच है ये प्यार |

©sumeghaagarwal 











Squirrel And Me

Squirrel And Me
DATELINE NEW DELHI
THE TRIBUNE OFFICE CP
12-9-1991


A little squirrel there on the terrace
Pokes and pokes into a big cloth she found there.

Is it a pantie or a shirt or a something?
What is she looking for in it?

Is it a grain attached to the cloth
or has she lost her ear-rings or the necklace?

no no no

I know what she looking for.
And she only told me that
lately she started feeling shy of being naked
when all around her clothe and clothe
not only their bodies but their souls too.

She told me
I am solid they are hollow, that is why
they need a wrap over their souls too.

The body is ok but the nakedness of the soul
they certainly could not reveal to all.
With body naked they could face some
but with the soul made naked
They Had It.

I wonder:
So what
What is new in that?

No comments please,
pleaded the squirrel.

You know what
Sometimes I feel if I too
Could adorn my beautiful soulful body
With some frilly, laced tiny clothies
And could dance and shout at the top of my voice
Look here I am with the wrap or without it

I Am.
I Am the Body.
I Am the Soul.
I Am the Creation.

:So what
Why do you make such fuss about it?
Your newly found curisoity to have your body wrapped in some frilly clothies.

You shut up.
I will do what I want to do
and would make a fuss too.
Watch it, if your clothes are
firmly attached to your body and oonh soul?

:Oofffffffffffffffff
It's Ok It's Ok It's OK

Then bye bye
and there goes the squirrel

A little squirrel there on the terrace
Pokes and pokes into a big cloth she found there.


©sumeghaagarwal 

Sunday, September 12, 2010

तुमसे पहले तुम्हारे चुने इस रास्ते पर

DATELINE INDIRAPURAM
9 /03 /06



तुमसे पहले तुम्हारे चुने इस रास्ते पर
चल चुके हैं और भी लोग

संकेरे हैं उन्होंने कांटे और उगाते चले गये फूल
करते रहे समतल, सुन्दर इस रास्ते को वो

तुम भी कर्म के महायज्ञ में
धर्मनीति पर चलते हुये
समयानूकूल आहुतियाँ देते रहोगे
इसी आशा में तुमसे पहले चले लोग
इसी रास्ते पर चल कर मंजिलो को
अपनी अपनी पहुँचते चले गये

तुम्हारी शक्ति हैं तुमसे पहले
चल चुके लोगों के साह्स में निष्ठा
तुम्हारी प्रेरणा है तुमसे पीछे
चलने वालों की आशाएं और अपेक्षाएं

चलते रहो वीर तुम
इस चयनित पथ पर

निडर, निर्भय, चलो की
जैसे विचरण कर रहे हो
किसी सुन्दर कानन वन
की सुरमई पगडण्डी पर

कोयों का कलरव तो है
पर अनभिज्ञ नहीं तुम
कोयल की कुहू कू से

पथ पर कंकर सही
पर ऊपर विराट आकाश
की नीलाई तुम्हे अपने
आगोश में रखे हुये है

अभी तो सूरज उगा था
फिर  चाँद भी अपनी जगह आ टंगेगा
उसे पता है कि गहन वन की
पगडंडियों पर निर्बाध चलने के लिए
उसे रोशनी देनी ही होगी

तुमसे पहले तुम्हारे इस
चुने रास्ते पर चल चुके हैं और भी लोग.

©sumeghaagarwal

उसके साये में पलती हैं

DATELINE GULMOHAR PARK NEW DELHI

15/07/05
For Anjali Gopalan

उसके साये में पलती हैं
जाने कितनी ही जिंदगिया

उसकी आँखों की चमक से
होती हैं कितनी ही राहें उजागर

बालो की उलझनों में
समेटे है जाने कितनो की उलझने

उसकी आवाज की गूँज से
जिंदगी उफान लेती है

फ़रिश्ता नहीं ना खुदा है वो
वो तो बस, बस एक ही
आम इन्सान है

अथक प्यार उसकी पहचान है

कभी उदास, कभी गुस्सा तो
वो भी होती होगी
पर खबर किसी को मिलती ही नहीं

वो तो बस एक, बस एक ही
आम इन्सान है.

©sumeghaagarwal

Saturday, September 11, 2010

जाने ये लोग मुझे चाहते हैं क्यों

DATELINE SYDNEY
28/10/03

जाने ये लोग मुझे चाहते हैं क्यों
मेरी जद्दोजहद तो सिर्फ
निकल जाने की है.

ना बांधो मुझे तुम यहाँ
सुना है वहां
मुक्ती  का राज है.

गलबहियां ना दो मुझे
मेरी सांसे बढ़ जाती हैं.

मत दो सहारा तुम मुझे
जोकि पैर कहीं इधर
ही जम ना जाएँ
मेरी जद्दोजहद तो सिर्फ
निकल जाने  की है.

यहाँ में अकेले ही चल सकती हूँ
दायें बाएं जगह नहीं है.

मत अटको तुम मेरे रास्ते में
मत पकड़ो पीछे से तुम
छाया को मेरी.

जाने भी दो मुझे.

जाने ये लोग मुझे चाहते हैं क्यों
मेरी जद्दोजहद तो सिर्फ
निकल जाने की  है.

©sumeghaagarwal

आधी अधूरी पर पूरी ये जिंदगी

DATELINE INDIRAPURAM
5 /10 /07

आधी अधूरी पर पूरी ये जिंदगी


अधूरी होली, अधूरी दिवाली
थोड़ी सी ईद, आधी सी क्रिसमस
बरसो से मेरी खिल्ली ये सब उड़ाती.

आती हैं, जाती हैं
ritual निभाने
रावन की जगह तीर मुझमे आजमाने.

पूरी सूली पर आधा-अधूरा
मुझे टांग जाती.

नियम  से हर साल
अपने-अपने नियत समय पर
आकर मुझे मुंह चिढाती
कि हम तो हैं पूरी
तुम  ही अधूरे.

अधूरेपन की धुरी पर
चकरघन्नी बन कर
आधी-अधूरी सांसों के दम पर
करने में जुटे हो तुम जीवन को पूरा.

चलो बहुत try  मार लिया 
समझो कि तुम कि
हो चाहे आधे-अधूरे 
पर जी है जिंदगी तुमने पूरी

हमें है आना, हमें है जाना 
बहुतो के दिल को बहलाना
आशायों को जगाना. 

हामिद की तरह जाओ मेले से
चिमटा तो ले आओ
दादी कभी मिल ही जाएगी. 

रंगों की पुडिया खोले  ही 
रखना कभी किसी को 
लगा तो सकोगे.

एक दीप हर दिवाली जलाते ही रहना 
पठाखे कोई उससे जला ही लेगा.

निजामुद्दीन के ठिये से
सिवैय्यों के झुरमुट लाते ही
रहना, कभी तो उन्हें
सही-सही बना ही लोगे.

ईसा के मंदिर में जाते ही रहना
कभी तो तुम्हारे मौन को वो सुनेगा.

हम भी अधूरे, तुम भी अधूरे
पर मिल कर हो जातें हैं पूरे.

 अधूरी होली, अधूरी दिवाली
थोड़ी सी ईद, आधी सी क्रिसमस
बरसों से मेरी खिल्ली ये सब उड़ाती.

©sumeghaagarwal

Sunday, September 5, 2010

सूत से कच्ची ये दोस्तियाँ

DATELINE SYDNEY
25 /01 /01

सूत से कच्ची ये दोस्तियाँ
पत्थर बने दिल, चट्टान सा अहम्
रेशम में लिपटे खुदरे-खुदरे लोग.

में कि गोद में पनपते-बढ़ते लोग
राहों में बिखरे कंकरों जैसे
कैसे ढोऊ में इन्हें.

सूत से कच्ची ये दोस्तियाँ
ये लिजलिजी दोस्तियाँ.

हाथ मिलाउ तो ये 
छिल-छिल जाएँ
कदम बढाऊँ तो ये
पैर जल-जल जाएँ.

एक कदम आगे बढ़ा के 
दस कदम पीछे हटती ये दोस्तियाँ.

 सूत से कच्ची ये दोस्तियाँ.  

English Translation

SHALLOW FRIENSHIPS
These friendships,
Are weaker than the cotton thread.

These stone-hearted, egoistical,
wrapped in silk but rough
and crude people,
nurtured in the lap of individualism
lie scattered on my path
like sharp pebbles.

How do I deal with them?
These friendships
Are weaker than the cotton thread.

These shallow friendships,
When I hold out my hand
it gets bruised

These friendships, take one step forward,
Ten steps backward at the same time.




©sumeghaagarwal

BE WITH ME

DATELINE NEW DELHI
circa 1992

Be with me
Like the soft clouds overhead.

I see you or not
But you be there
For those moments
When I like
To be soaked in your love.

I carry on with my travails
But you follow my trail
Without me knowing it
Without me feeling the itch
To get rid of you.

You don't knock at my door
I am lost in my world
Which includes you.

You just come and caress me
Toe to head
In your unconditional love
Your unending compassion.

You have touched me
My friend
A touch
Like that of soft clouds overhead.

©sumeghaagarwal

I am a solitary walker

DATELINE SYDNEY
13/04/01


I am a solitary walker
On the shifting sands.

I try to stand firm
Waves wash away ground beneath me
Grain by grain
As my life ebbs away
Breath by breath.

I leave behind my footprints
Waves come rushing to them
As I watch my footprints disappear.

I go deeper, dig deeper in the sand
Waves go fiercer
They need their fodder.

Deeper I go, deeper they go
Continue eating the ground beneath me  grain by grain
My life ebbs away breath by breath.

I am a solitary walker
On the shifting sands.

©sumeghaagarwal








Saturday, September 4, 2010

मेरे कदम चाँद पर

DATELINE INDIRAPURAM
8 /03 /2006

मेरे कदम चाँद पर
चहलकदमी करते हैं
और वो यहीं
जमीन पर घुटने टिकाये
इर्द-गिर्द फैले टुकड़े-टुकड़े
दाने को ही बटोरते रहते हैं .

कह-कह कर थक गई
आओ उठो तुम भी
थोडा चाँद पर चहलकदमी करके तो देखो
उठ नहीं सकते तो पकड़ो मेरा हाथ
और खिंचे चले आओ यहाँ तक.

मेरे कदम चाँद पर
चहलकदमी करते हैं


यहाँ कई और कदमो की आहट
मुझे सुनाई देती है 
अहसास है मुझे इन सह्पथिको की उपस्थति का
पर लगता है सब बहुत शर्मीले हैं 
इस विस्तार में अलग-अलग
खुद अपने ही साथ 
निशब्द ही टहलते रहते हैं.

मायूस वो भी हैं
सोच कर कि जाने कितने ही साथी
जमीन पर घुटने टिकाये
बंदरबांट में ही जीवन
कि तलहटी पर रेंगते न रह जाएँ. 

चलो छोड़ो जाने भी दो
जब तुम्हे फुर्सत हो तो
इस रस्ते भी चले आना
चाहे अनचाहे , तो यहीं चाँद पर
फिर  मुलाकात होगी.

मेरे कदम चाँद पर
चहलकदमी करते हैं
और वो यहीं
जमीन पर घुटने टिकाये
इर्द-गिर्द फैले टुकड़े-टुकड़े
दाने को ही बटोरते रहते हैं.

©sumeghaagarwal














Thursday, September 2, 2010

PUPS FOR ADOPTION IN INDIRAPURAM, GHAZIABAD

PUPS FOR ADOPTION IN INDIRAPURAM, GHAZIABAD



I have been sheltering four lovely pups of a bitch that lives around in my apartment building. Worried about their safety, I brought them up and kept them in the space next to the staircase near my flat.

I no time, we had some bowls for them to give food and water and one kind resident donated a tube shaped little tent for them. They quickly settled in and their mother came around to feed them.

I have named them as Parchum, Chumchum, Titli and Jogin.

They are now one month old and each has a distinct personality. Parchum is a simpleton, Chumchum is royal in his manners, Titli is too agile and naughty, Jogin is meditative and loves to sleep flat on her tummy. Parchum is full black with white snout, Chumchum is all white with beautiful tiger like black patches, Titli is all black, Jogin is dark brown with a blackish strip running through her spine.


They are born of a street dog but they are beautiful and being taken good care of. They lounge around in my lounge room, play with my slippers, furniture, newspapers and what not.


Please take them home. The are lovely and with your good care can become good pets. My heart bleeds for letting them go but I am unable to keep them as I live in a flat and often I am out of town.
Soon I shall post their photographs as well.


Please get in touch on meghalive@gmail.com or call 9899 29 3449


Many thanks
sumegha


About Me

My photo
I am a dreamer, an optimist, a person with a voice. A normal being who trained as a media professional in India and Australia. I am also a trained community worker. I love trying out new things, taking up new ventures etc. etc. I am bilingual and multicultural. I am a planetarian and try my best to live beyond barriers created by often very unkind human kind for humans and other more important living beings. I live my life reading, thinking, writing and talking.